Thursday, April 30, 2026
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‘ज्ञानभारतम’ से छत्तीसगढ़ गढ़ रहा नई राष्ट्रीय पहचान, ऐतिहासिक दस्तावेज हमारी सभ्यता और संस्कृति की जीवंत आत्मा….

रायपुर: भारत की सांस्कृतिक परंपरा विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। हमारे पूर्वजों ने ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, चिकित्सा, कला और साहित्य के विविध आयामों को पांडुलिपियों, ताम्रपत्रों और हस्तलिखित ग्रंथों के रूप में संरक्षित किया है। ये केवल ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की जीवंत आत्मा हैं। “ज्ञानभारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण” के माध्यम से हम इस अमूल्य धरोहर को खोजने, सहेजने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का एक व्यापक और दूरदर्शी अभियान चला रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में इस अभियान को जन आंदोलन का स्वरूप देने की दिशा में लगातार कार्य किया जा रहा है। गांव-गांव और घर-घर तक पहुँचकर पांडुलिपियों की खोज का कार्य किया जा रहा है, जिससे समाज की सहभागिता भी सुनिश्चित हो रही है। इस प्रयास का सकारात्मक परिणाम यह है कि नागरिक स्वयं आगे आकर अपने निजी संग्रहों में सुरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों को साझा कर रहे हैं।

हाल ही में दामाखेड़ा क्षेत्र में 326 वर्ष पुरानी दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियों की प्राप्ति इस अभियान की बड़ी सफलता के रूप में सामने आई है। इन पांडुलिपियों में तत्कालीन समाज, धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक परिस्थितियों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो शोध और अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी क्रम में बिलासपुर जिले के ऐतिहासिक स्थल मल्हार से लगभग 2,000 वर्ष पुराना ताम्रपत्र प्राप्त होना छत्तीसगढ़ की गौरवशाली विरासत को और अधिक समृद्ध करता है। इस ताम्रपत्र में प्राचीन काल के शासन, दान व्यवस्था और सामाजिक संरचना का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था कितनी विकसित और संगठित थी।

अंबिकापुर एवं अन्य क्षेत्रों में भी 17 वीं शताब्दी सहित विभिन्न कालखंडों की दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज की गई है। इन पांडुलिपियों का “ज्ञानभारतम ऐप” के माध्यम से डिजिटलीकरण किया जा रहा है, जिससे उनका दीर्घकालीन संरक्षण सुनिश्चित हो सके। आधुनिक तकनीक के उपयोग से इन धरोहरों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए सुलभ भी बनाया जा रहा है।

मेरा मानना है कि पांडुलिपियाँ केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक भी हैं। इनमें निहित ज्ञान आज भी प्रासंगिक है और समाज को दिशा देने में सक्षम है। इसी दृष्टिकोण से हमने इस अभियान को जनभागीदारी से जोड़ते हुए एक व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप दिया है। हमारा लक्ष्य केवल संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इन पांडुलिपियों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना भी है।

डिजिटलीकरण और शोध के माध्यम से छत्तीसगढ़ को ज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में एक नई पहचान दिलाने की दिशा में हम निरंतर प्रयासरत हैं। मैं विशेष रूप से युवाओं से आह्वान करता हूँ कि वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझें और इस अभियान से जुड़ें। जब हम अपने इतिहास और परंपरा को जानेंगे, तभी हम आत्मविश्वास के साथ भविष्य का निर्माण कर सकेंगे। “ज्ञानभारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण” हमारी सांस्कृतिक अस्मिता को सशक्त करने का एक व्यापक अभियान है। यह न केवल हमारी विरासत को सुरक्षित रखेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान, प्रेरणा और गर्व का स्थायी स्रोत भी बनेगी।

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