जहां कभी खौफ का था, दबदबा, वहां 80 साल बाद लहराया तिरंगा

तुमीरगुंडा और केरपे में पहली बार हुआ ध्वजारोहण, पूर्व मंत्री महेश गागड़ा की मौजूदगी में दिखी बदलते बस्तर की तस्वीर
बीजापुर। नक्सल प्रभावित बस्तर के सुदूर और दुर्गम अंचल में स्वतंत्रता दिवस ने इस बार इतिहास रच दिया। ग्राम पंचायत बेदरे के अंतर्गत आने वाले अंदरूनी गांव तुमीरगुंडा में आजादी के 80 वर्षों बाद पहली बार तिरंगा शान से लहराया। पूर्व मंत्री महेश गागड़ा की मौजूदगी में हुए ध्वजारोहण समारोह ने कभी नक्सली भय के साये में रहे इस इलाके में लोकतंत्र, राष्ट्रभक्ति और लौटते विश्वास की नई तस्वीर पेश की।
दुर्गम रास्तों और कई नालों को पार करते हुए पूर्व मंत्री महेश गागड़ा तुमीरगुंडा और केरपे पहुंचे। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद ग्रामीणों के बीच पहुंचकर उन्होंने ध्वजारोहण किया। गांव में पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाने को लेकर ग्रामीणों में खासा उत्साह और भावुकता देखने को मिली।
भय की जगह विश्वास का संदेश
कभी ऐसे इलाके में राष्ट्रीय पर्व पर तिरंगा फहराना भी आसान नहीं था। लेकिन बदलते हालात के बीच अब ग्रामीण खुले तौर पर स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। तुमीरगुंडा में तिरंगे का लहराना केवल एक औपचारिक ध्वजारोहण नहीं, बल्कि बस्तर के उन इलाकों में लोकतांत्रिक विश्वास की मजबूत होती वापसी का प्रतीक बनकर सामने आया।
महेश गागड़ा ने कहा कि इन दुर्गम गांवों तक पहुंचकर पहली बार तिरंगा लहराते देखना उनके लिए गौरव और भावुकता का क्षण है। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों का उत्साह यह भरोसा दिलाता है कि बस्तर शांति और विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। दूरस्थ क्षेत्रों तक विकास की सुविधाएं पहुंचाना और युवाओं को बेहतर अवसर उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए।
खेलों में दिखा ग्रामीणों का उत्साह
कार्यक्रम के दौरान तुमीरगुंडा और केरपे में रस्साकशी, वॉलीबॉल सहित विभिन्न खेल प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। ग्रामीणों और युवाओं ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लिया। महेश गागड़ा ने खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करते हुए विजेता प्रतिभागियों को पुरस्कार वितरित किए।
शहीद परिवारों और बुजुर्गों का सम्मान
समारोह में गांव के शहीद परिवारों और वरिष्ठजनों को शाल एवं श्रीफल भेंटकर सम्मानित किया गया। वीर जवानों के परिजनों का सम्मान कार्यक्रम का सबसे भावुक क्षण रहा। ग्रामीणों ने अपने शहीदों के बलिदान को श्रद्धापूर्वक याद किया।
80 साल बाद तुमीरगुंडा में लहराता तिरंगा उस बदलाव की गवाही देता नजर आया, जहां भय की जगह विश्वास, अलगाव की जगह लोकतंत्र और अंधेरे की जगह विकास की उम्मीद आकार ले रही है।दुर्गम बस्तर की धरती पर फहराया गया यह तिरंगा ग्रामीणों के लिए नई उम्मीद और बेहतर भविष्य का प्रतीक बन गया।









