मुर्गेश शेट्टी,बीजापुर। जिले के भोपालपटनम ब्लॉक अंतर्गत ग्राम उल्लूर संजयपारा स्थित शासकीय प्राथमिक शाला बीते छह वर्षों से किचन शेड में संचालित हो रही है। महज 5 किलोमीटर दूर स्थित यह स्कूल विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय की नज़रों के सामने है, फिर भी हालात बदतर हैं। स्कूल का मूल भवन पिछले 10 वर्षों से जर्जर अवस्था में पड़ा है — छत झुकी हुई है, दीवारों में दरारें हैं और जानलेवा हादसे का डर बना रहता है। सुरक्षा के लिहाज से शाला को किचन शेड में स्थानांतरित कर दिया गया, लेकिन हालात वहां भी बेहतर नहीं।

मिट्टी की लिपाई, बारिश में जलमग्न कक्षाएं
प्रधानाध्यापक श्यामनाथ यादव बताते हैं कि किचन शेड में पक्की फर्श नहीं है। फर्श की मिट्टी से लिपाई की जाती है और बारिश के मौसम में पानी भर जाता है। नतीजतन बच्चे पानी और कीचड़ में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं। यह स्थिति ‘शिक्षा के अधिकार’ की जमीनी हकीकत को उजागर करती है।

प्रस्तावों की भरमार, समाधान शून्य
ग्रामीणों और स्कूल प्रबंधन समिति ने भवन के जीर्णोद्धार और नए निर्माण के लिए कई प्रस्ताव विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय में भेजे हैं। यहां तक कि सुशासन तिहार में भी आवेदन सौंपे गए, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही, बल्कि संवेदनहीनता को दर्शाती है।

संसाधन नहीं, पर सपनों की उड़ान जारी
हालात चाहे जैसे भी हों, मगर इस विद्यालय की छात्रा लावन्या कुरगुड़ ने इन विषम परिस्थितियों को मात देते हुए जवाहर नवोदय विद्यालय में स्थान प्राप्त किया है। यह उदाहरण साबित करता है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं, परंतु उसे संवारने के लिए न्यूनतम शैक्षणिक ढांचा आवश्यक है।

क्या यही है शिक्षा का अधिकार ?
अब सवाल उठता है — क्या शिक्षा का अधिकार केवल कागजों तक सीमित है? क्या एक होनहार छात्रा को भी पक्की छत के नीचे पढ़ाई करने का हक नहीं है? किचन शेड में बैठकर ज्ञान अर्जन करने वाले ये बच्चे और उनका संघर्ष, हमारे सिस्टम पर एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं

